13.1 बियरिंग का परिचय एवं आवश्यकता
(Introduction and Need of Railway Coach Bearing System)
रेलवे कोच का प्रत्येक पहिया (Wheel) अत्यधिक भार (Load) वहन करते हुए उच्च गति (High Speed) पर निरंतर घूमता रहता है। यदि पहिया सीधे एक्सल (Axle) या एक्सल जर्नल (Axle Journal) पर घूमे, तो दोनों धातु सतहों के बीच अत्यधिक घर्षण (Friction) उत्पन्न होगा, जिससे गर्मी (Heat Generation), घिसाव (Wear), शक्ति की हानि (Power Loss) तथा अंततः यांत्रिक विफलता (Mechanical Failure) हो सकती है।
इसी समस्या के समाधान के लिए बियरिंग (Bearing) का उपयोग किया जाता है। बियरिंग पहिए को न्यूनतम घर्षण के साथ सुचारु रूप से घूमने की सुविधा प्रदान करती है तथा वाहन के भार को सुरक्षित रूप से एक्सल से पहिए तक एवं पहिए से रेल पथ तक स्थानांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आधुनिक भारतीय रेलवे में अधिकांश कोचों में सीलबंद रोलर बियरिंग (Sealed Roller Bearing / Cartridge Roller Bearing) का उपयोग किया जाता है। ये बियरिंग उच्च गति, भारी भार, कम अनुरक्षण (Low Maintenance) तथा अधिक विश्वसनीयता (High Reliability) के लिए विकसित की गई हैं।
इस प्रकार बियरिंग केवल एक यांत्रिक अवयव (Mechanical Component) नहीं, बल्कि रेल सुरक्षा (Rail Safety), परिचालन विश्वसनीयता (Operational Reliability) तथा यात्री सुविधा (Passenger Comfort) का आधार है।
बियरिंग क्या है?
(What is a Bearing?)
बियरिंग (Bearing) वह यांत्रिक अवयव है जो दो भागों के बीच सापेक्ष घूर्णन (Relative Rotation) को कम घर्षण (Low Friction) के साथ संभव बनाता है तथा उन पर लगने वाले भार (Load) को सुरक्षित रूप से वहन करता है।
रेलवे कोच में बियरिंग का मुख्य कार्य—
- पहियों को स्वतंत्र रूप से घूमने देना।
- घर्षण कम करना।
- भार को समान रूप से वितरित करना।
- ऊष्मा उत्पन्न होने को न्यूनतम रखना।
- एक्सल एवं व्हीलसेट (Wheelset) की आयु बढ़ाना।
- सुरक्षित एवं स्थिर परिचालन सुनिश्चित करना।
रेलवे कोच में बियरिंग का स्थान
(Location of Bearing)
रेलवे कोच में प्रत्येक एक्सल के दोनों सिरों (Axle Ends) पर एक-एक बियरिंग लगी होती है। यही बियरिंग एक्सल और बोगी (Bogie) के बीच घूमने की व्यवस्था प्रदान करती है।
सरल रूप में इसकी स्थिति निम्न प्रकार समझी जा सकती है—
Bogie Frame│Axle Box Housing│Bearing│Axle Journal│Wheel
यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि पहिया एवं एक्सल एक इकाई (Wheelset) के रूप में घूमते रहें, जबकि बोगी फ्रेम स्थिर समर्थन प्रदान करता है।
बियरिंग की आवश्यकता
(Need of Bearings)
यदि रेलवे कोच में बियरिंग न हो, तो—
- घर्षण अत्यधिक बढ़ जाएगा।
- पहिए का घूमना कठिन हो जाएगा।
- अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होगी।
- धातु का तेजी से घिसाव होगा।
- ऊर्जा की खपत बढ़ेगी।
- पहिए के जाम (Wheel Seizure) होने की संभावना रहेगी।
- दुर्घटना का जोखिम बढ़ जाएगा।
इसी कारण प्रत्येक आधुनिक रेलवे वाहन में उपयुक्त बियरिंग का उपयोग अनिवार्य है।
बियरिंग के प्रमुख कार्य
(Functions of Bearing)
रेलवे बियरिंग अनेक महत्वपूर्ण कार्य करती है—
1. घर्षण कम करना (Reduction of Friction)
Sliding Friction को Rolling Friction में परिवर्तित कर ऊर्जा की बचत करना।
2. भार वहन करना (Load Carrying)
बियरिंग निम्न प्रकार के भारों को सुरक्षित रूप से वहन करती है—
- Radial Load
- Axial (Thrust) Load (जहाँ लागू)
- Dynamic Load
3. सुचारु घूर्णन (Smooth Rotation)
उच्च गति पर भी पहियों का संतुलित एवं कंपन-रहित घूर्णन सुनिश्चित करना।
4. ऊष्मा नियंत्रण (Heat Control)
कम घर्षण के कारण अनावश्यक ताप वृद्धि को रोकना।
5. सेवा आयु बढ़ाना (Increase in Service Life)
एक्सल, व्हील एवं संबंधित यांत्रिक अवयवों के घिसाव को कम करके उनकी उपयोगी आयु बढ़ाना।
6. परिचालन सुरक्षा (Operational Safety)
बियरिंग की सही स्थिति ट्रेन की सुरक्षित गति, स्थिरता तथा विश्वसनीय संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
रेलवे बियरिंग पर कार्य करने वाले भार
(Loads Acting on Railway Bearings)
रेलवे बियरिंग केवल वाहन का स्थिर भार ही नहीं उठाती, बल्कि अनेक प्रकार के गतिशील बलों का सामना करती है।
मुख्य भार निम्न हैं—
स्थिर भार (Static Load)
कोच, यात्रियों एवं उपकरणों का स्थिर भार।
गतिशील भार (Dynamic Load)
गति, झटकों, रेल जोड़, मोड़ों एवं कंपन के कारण उत्पन्न अतिरिक्त भार।
पार्श्व भार (Lateral Load)
Curve पर चलने के दौरान उत्पन्न पार्श्व बल।
आघात भार (Impact Load)
रेल की असमानता, पॉइंट एवं क्रॉसिंग, अथवा अन्य परिचालन परिस्थितियों से उत्पन्न अचानक लगने वाले बल।
आधुनिक रेलवे में बियरिंग का महत्व
वर्तमान समय में भारतीय रेलवे में LHB Coaches, MEMU, EMU, वंदे भारत तथा अन्य आधुनिक कोच उच्च गति पर संचालित होते हैं।
ऐसी स्थिति में बियरिंग की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि—
- गति अधिक है।
- भार अधिक है।
- अनुरक्षण अंतराल (Maintenance Interval) लंबा है।
- सुरक्षा मानक अधिक कठोर हैं।
इसी कारण आधुनिक बियरिंग उच्च गुणवत्ता वाले इस्पात (Bearing Steel), उन्नत सीलिंग (Advanced Sealing) तथा विशेष ग्रीस (Special Grease) के साथ निर्मित की जाती हैं।
C&W कर्मचारी की दृष्टि से महत्व
Carriage & Wagon विभाग के कर्मचारियों के लिए बियरिंग का ज्ञान केवल सैद्धांतिक विषय नहीं है।
उन्हें निम्न संकेतों की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए—
- Hot Axle
- Hot Box
- Grease Leakage
- Bearing Noise
- Seal Damage
- Abnormal Vibration
- Wheel Rotation Resistance
इन संकेतों की समय पर पहचान संभावित दुर्घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
व्यावहारिक उदाहरण
एक एक्सप्रेस ट्रेन के मार्ग निरीक्षण के दौरान एक कोच के एक्सल बॉक्स (Axle Box) से असामान्य ताप एवं हल्की जली हुई ग्रीस की गंध महसूस हुई। C&W कर्मचारी ने तत्काल विस्तृत निरीक्षण कराया। जाँच में बियरिंग की सील क्षतिग्रस्त पाई गई, जिससे ग्रीस बाहर निकल रही थी और बियरिंग पर्याप्त स्नेहन के बिना कार्य कर रही थी।
निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दोषपूर्ण बियरिंग असेंबली को सेवा से हटाकर प्रतिस्थापित किया गया। समय रहते दोष की पहचान होने से संभावित Hot Axle तथा गंभीर परिचालन विफलता टल गई।
महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु
- बियरिंग का मुख्य कार्य घर्षण कम करना एवं भार वहन करना है।
- आधुनिक रेलवे कोचों में मुख्यतः सीलबंद रोलर बियरिंग (Sealed Roller Bearing / Cartridge Roller Bearing) का उपयोग किया जाता है।
- बियरिंग की खराबी से Hot Axle, Hot Box, अत्यधिक ताप, कंपन तथा गंभीर यांत्रिक विफलता हो सकती है।
- बियरिंग की विश्वसनीयता सुरक्षित रेल संचालन का महत्वपूर्ण आधार है।
- C&W कर्मचारियों के लिए बियरिंग निरीक्षण एवं प्रारंभिक दोष पहचान अत्यंत आवश्यक है।
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